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पर चोर की माँ का क्या करें ?

Posted On: 1 May, 2017 में

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कुछ लोग नाक पूच कर दीवार पर फेंक देते कुछ रुमाल में लपेटकर जेब में रख लेते है ये दूसरी बात है कि जेब में रखने वाला ही समाज का सभ्य नागरिक समझा जाता हैं. लेकिन राजनीति में ऐसा नहीं होता यहाँ एक दुसरे के ऊपर फेंका जाता है. मैं अभी-अभी विद्वानों के बीच से उठकर आया हूँ विद्वान आप जानते होंगे सोशल मीडिया पर बैठे है हाथ में मोबाइल लिए कुछ गाय बचा रहे है, कुछ मजहब, कुछ तमगे लिए बैठे है और कुछ के पास लिंक है जहाँ किसी ने कोई सवाल सरकार से किया वो लिंक लेकर मुंह पर दे मारते है. कश्मीर के लिए नेहरु दोषी और नक्सलवाद के लिए कांग्रेस. भले छतीसगढ़ में पिछले 14 साल से भाजपा की सरकार हो.

लेकिन लोकतंत्र के मंदिर यह सब जायज है एक यही तो वो जगह है जहाँ विचारों का चढावा चढाकर सत्ता पाई जाती है. जब छोटा था एक कहावत सुनता था चोर को मत पकड़ो चोर की माँ को पकड़ों जिसने उसे चोर बनाया. लेकिन अब ये कहावत प्रसांगिक नहीं रही क्योंकि जब देश में चोर की माँ मलाई खा रही है. और चोर के मानव अधिकार लिए बैठी, उसकी बोलने की आजादी का रोना रोती है. वो चोर के लिए रोजगार मांगती है वो चोर के लिए स्कूल चाहती है लेकिन चोर से कहती है उड़ा दे स्कूल. उखाड़ दे सडक और मूलभूत सुविधाओं को मर जा या मार दे हमारे पास विचारधारों का गर्भ है उसके पेट से तेरे जैसे निकलते रहेंगे.

यही तो हो रहा विचारधारा का युद्ध सीरिया हो या इराक पाकिस्तान हो अफगानिस्तान भारत हो बांग्लादेश सब जगह विचारवान माएं बैठी है वातानुकूलित कमरों में सबके बेटे लड़ रहे है कोई मजहब के लिए, कोई आजादी के लिए, किसी को अजान की पड़ी है किसी को गाय की पर इंसानों की किसी को चिंता नहीं. मजहब बचाने को सैकड़ो किलकारी आपको सुनाई देगी बम की आवाज सुनाई देगी लेकिन इन्सान को बचाने के लिए एक आवाज सुनने को आपके कान तरस जायेंगे. पीर, मजार, देवी देवता के लिए झुण्ड इक्कठे होते दिखाई देंगे पर किसी गरीब के दर्द या चीख पर आपको विरले ही कोई खड़ा नजर आये. यार असल बात यह है वो माल बिकता है जिसे खरीदने वाले ग्राहक हो अभी राष्ट्रवाद और मजहब बिक रहा है मैं बेमतलब इस हाट में मानवता की रेहड़ी लगाकर खड़ा हो गया.

हर तीसरे दिन एक चीज में जरुर सुनता हूँ अब तो कान पक गये कि दुनिया के किसी मजहब में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है कहने वालों की बात पर मुझे विश्वास भी है किन्तु मुझे लगता है हिंसा के लिए मजहब की जरूरत जरुर होती. एक विचारवान मनुष्य होने के नाते आप सोच सकते है कि यहाँ किसको किसके भले की पड़ी है! क्या अलगाववादी पत्थरबाजों का सुरक्षित भविष्य चाहते है? क्या नक्सली नेता या वो विचारवान माएं जो लेनिन, मार्क्स और माओंवाद को दिमाग में लिए बैठे है क्या वो उनका अच्छा भविष्य चाहते है? यदि चाहते है तो कभी इनकी सगी औलादे ना नक्सली बनती ना पत्थरबाज क्यों? कारण यह सब बस विचारों की माताएं है. जो अपने व्यक्तिगत सुखो के लिए इनका पालन पोषण करती रहती है.

माओवाद को गौर से पढो तो लगेगा यह  विचार सत्ता पाने के लिए जल्दबाजी में बनाया गया विचार है. इनका नारा है उच्च शाशित वर्ग से शोषित समाज का छुटकारा. यह लोग समतावादी होने का दंभ भरते है ज्यादा पढोगे तो आपके इनके बहुत सारे लेख और टिप्पणिया गूगल महाराज पर मिल जाएगी. आपको बहुत लेख और मिल जाएंगे  जो नक्सली हमलों पर बारीकियों के साथ पर अच्छे से प्रकाश डालेंगे. जिन्हें पढ़कर लगेगा समस्या समाप्त है बस इन साहब का कहा मान लीजिये. लेकिन उस केंद्र पर नहीं जायेंगे जहाँ ये माएं सबसे नजर बचा कर इस देश के कई विश्विद्यालयों में भी फल-फूल रही है. जिसका मकसद देश की सत्ता और उस से भी ऊपर देश की व्यवस्था को उखाड़ फेकना है. मतलब कि भारतीय राज्य को ही बम बारूद के दम पर समाप्त कर के एक ‘माओवादी-वामपंथी’ राज्य की स्थापना करना है.

हर हमले के बाद मुंह तोड़ने  गर्दन तोड़ने  जवाब दिए जाते है, लेकिन वो कलम कभी नही तोड़ी जाएगी जहाँ से यह वैचारिक अस्त्र शस्त्र निकल रहे है. जो इन गरीब लोगो को सपने बेच रहे है वो भी उनका खून लेकर. अभी एक साहब ने बहुत अच्छा लिखा कि माओवाद या नक्सलवाद दरअसल एक ‘खुनी क्रांतिकारी’ विचारधारा है और इसके लिए खून देना होता है, आहूति देनी होती है.. लेकिन किसकी? इसका जवाब दिल्ली, हैदराबाद जैसे शहरों में अपने एसी कमरों में आराम से बैठे कई नक्सल-प्रेमी आपको देंगे कि “जनाब, भारतीय राज्य ने जिनका दमन किया है उन्हें ही तो इस लड़ाई में अपनी जान देनी होगी, हम तो बस उन्हें वैचारिक अस्त्र-शस्त्र दे सकते हैं”. यानि कि गरीब, दलित-आदिवासी ही गोलियों का निशाना बनें और ये लोग आराम से उनकी मौत पर राजनीतिक रोटियां सेकें और फिर चिल्लाए कि देखो भारत क्या करता है अपने आदिवासियों के साथ. इस “अत्याचार” से मुक्ति चाहिए है तो नारा आएगा, बस्तर मांगे आजादी, कश्मीर मांगे आजादी, बन्दुक से लेंगे आजादी लड़कर लेंगे आजादी…..राजीव चौधरी

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