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बस आप टोपी उतारों तो कोई फैसला हो?

Posted On: 16 Mar, 2017 में

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अभी पिछली ग्यारह मार्च से भारत समेत पाकिस्तान की मीडिया में उत्तरप्रदेश में भाजपा की जीत पर मंथन चल रहा है. पाकिस्तान में तो बड़े-बड़े तजियकार, पेनेलिस्टो के साथ पुराने पत्रकार भी अपने कोट झाड़ पोंछ कर बैठे है. उनकी परेशानी यह कि उत्तरप्रदेश में लोगों ने जाति धर्म से ऊपर उठकर वोट क्यों किया!! इधर भारत का रुख करें तो जेएनयू के एक छात्र की आत्महत्या को दलित हत्या नहीं बना पाए तो बड़ी-बड़ी प्रेस कांफ्रेंस कर ईवीएम पर सवाल खड़े किये जा रहे है. खैर लोग इसे राजनीति कह रहे है लेकिन में इसे करोड़ों मतदाताओं के जनादेश का अपमान लिखूंगा. यह ईवीएम मशीन पर सवाल नहीं बल्कि उन मतदाताओं की लोकतंत्र के प्रति आस्था पर सवाल है जो इस लोकतंत्र की रक्षा के लिए सीमा से लेकर गलियों तक रक्षा करते है. चुनाव सभा में हाथ हिला देने या पहले से तैयार किए गए भाषण दे देने भर से किसी इंसान की राजनीतिक क्षमताओं का आकलन नहीं किया जा सकता.

लेकिन मीडिया की खबरों, नेताओं की बयानबाजी और फिल्मी प्रमोशन के अलावा भी बहुत खबरें होती जो दिल को सुकून और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य का बोद्ध कराती है

जहाँ देश में राष्ट्रवाद और गद्दारी के प्रमाण पत्र सोशल मीडिया पर बिक रहे हो! लेकिन खुशी तब मिलती है, यहाँ कोई मो. सरताज सीना तानकर खड़ा होकर अपने आतंकी बेटे सैफुल्ला का शव को लेने से इंकार करते हुए राष्ट्रवाद की अनूठी इबारत लिख जाये.

जहाँ टीवी के पर्दों पर विराट क्रिकेटरों के प्रेम फसाने चल रहे हो! लेकिन खुशी मिलती है तब यहाँ के नेत्रहीन क्रिकेटर पाकिस्तान को नौ विकेट से हराकर नेत्रहीन टी-20 विश्व कप का खिताब जीत लाये है.

जहाँ देश की एक यूनिवर्सिटी में नारा लगता हो कि मणिपुर मांगे आजादी! लेकिन खुशी मिलती है वहां 80 फीसदी मतदान होकर उनके मुंह पर तमाचा लग जाये.

जहाँ हजारों लोग अपनी मन माफिक मांगो के लिए लोग सड़कें खोद रहे हो! लेकिन खुशी मिलती है तब वहां कोई दादा राव बिल्होरे लोगों को बचाने के मकसद से सड़क के गड्ढे भरता दिख जाये!

जहाँ कश्मीर के मजहबी उन्माद में पागल युवा हर रोज देश की सेना पर पत्थर फेंक रहे हो! लेकिन खुशी मिलती है तब कश्मीर की कोई बेटी तंजुमल इस्लाम एक नया इतिहास रचकर इटली से किक बाक्सिंग में देश के लिए गोल्ड मेडल जीत लाये.

जहाँ चंद धार्मिक ठेकेदार लोगों को जहालत से निकालने की बजाय उन्हें अपने एजेंडे का चारा बनाना चाहते हो! लेकिन खुशी मिलती है तब वहां गोरखपुर के एक मंदिर में हिन्दू मुस्लिम एक साथ पूजा कर साम्प्रदायिक सौहार्द की एक मिसाल बन जाये.

जब हजारों महिला शोषण का शिकार बनी न्याय के लिए घूम रही हो! लेकिन तब अच्छा लगता है छतीसगढ़ पुलिस की 24 वर्षीय कांस्टेबल समिता तांडी नारी शक्ति पुरस्कार जीत लाये.

जहाँ हर रोज पड़ोसी देश से नफरत की आग उगली जाती हो! लेकिन खुशी मिलती है तब वहां से कोई ग्यारह साल की अकीदत नावेद की चिठ्ठी शांति का पैगाम लेकर पाकिस्तान से आये.

जहाँ फतवों के डर हजारों मुस्लिम बच्ची खोफ से घर में दुबकी हो! वहां 46 फतवों से बेखोफ कोई नदिया आफरीन मुल्ला मौलवियों के सामने आँख में आँख डालकर खड़ी हो जाये.

जहाँ देश की एक बड़ी पार्टी पर साम्प्रदायिक होने टेग लग रहा हो! लेकिन खुशी मिलती है तब वहां लोग जाति सम्प्रदाय से ऊपर उठकर वास्तविक लोकतंत्र को दिशा दे जाये.

नेताओं को समझना होगा देश की जनता ने सोच बदल ली अब बारी आपकी है. कभी सेना पर तो कभी मतदान पर ऊँगली उठाकर, अपने विरोधी का चुनावी घोषणा पत्र फाड़ने और एक गरीब इंसान के घर खाना खा लेने भर से 125 करोड़ लोगों को नेता बनने का सपना नहीं देखा जा सकता. जातिवाद, धर्म सम्प्रदाय की टोपियाँ अब नहीं चलेगी.

बस अब आप टोपी उतारों तो कोई फैसला हो, लोग कहते है दिमाग सेट होता है टोपियों में..!! राजीव चौधरी

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